उत्तराखण्ड यात्रा:- थलीसैण से श्रीनगर, टेहरी और दिल्ली वापसी

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थलीसैण से जब आगे बढे तो दिन के तीन बज चुके थे। गढ़वाली में इस क्षेत्र को “राठ” के नाम से जाना जाता है। और यहाँ के निवासियों को “राठी”। आजादी के बाद से यह क्षेत्र विकास की दृष्टि से सदैव उपेक्षित ही रहा था, स्कूल, कॉलेज, सड़क, अस्पताल कुछ वर्षों तक इस क्षेत्र में बामुश्किल ही थे। मुझे याद है कि जब मैं श्रीनगर (गढ़वाल) में छात्रावास में पढता था तो मेरा एक सहपाठी इस क्षेत्र से ही था। छुट्टियों में जब हम अपने-अपने घर जाते थे तो लगभग सभी दोस्त सुबह चलकर शाम तक अपने घर पहुँच जाते थे। जबकि इस मित्र को पहुँचने में दो दिन लगते थे। उसको अपने अन्तिम बाजार, जहाँ तक सड़क थी उसके बाद भी 24 किलोमीटर पैदल चलकर अपने गाँव पहुँचना होता था। खैर…ये तब की बात थी। अभी इस क्षेत्र में अच्छी-खासी सड़कें बन गई हैं। और जब सड़कें बन गई हैं तो विकास खुद ब खुद हो ही जाता है। घूमने के लिहाज़ से यह क्षेत्र अभी भी अछूता ही है। इसके लिए मुझे यहाँ दुबारा आना ही होगा।

थलीसैण से कुछ पहले एक सड़क सीधे रामनगर होकर कुमाऊं के लिए निकल जाती है, लेकिन हमें रुद्रप्रयाग पहुँचना था इसलिए पौड़ी की ओर जाने वाली सड़क पकड़ ली थी। मनु भाई सुबह से ड्राइव कर रहे थे, एक जगह उनको नींद की झपकी आई तो गाडी अनियंत्रित हो गई। इससे आगे ड्राइविंग की कमान शशि भाई ने सम्भाल ली। आगे चलकर एक जगह बरसुडी गाँव पड़ा तो रुककर सड़क किनारे लगे गाँव के बोर्ड के साथ एक फ़ोटो खींचकर आगे बढ़ चले। भरसार, पाबों बिना रुके पार हो गए। यहाँ पहुँचते-पहुँचते सूर्यदेव भी अस्त हो चुके थे। अभी से एहसास होने लगा था कि आज समय से रुद्रप्रयाग तो किसी भी सूरत में नहीं पहुँच सकते। आगे चलकर जब पौड़ी-खिर्सू मार्ग पर पहुँचे तो अँधेरा छाने लगा था। यहाँ से दाहिनी ओर चलते तो खिर्सू-देवलगढ़ होकर रुद्रप्रयाग पहुँच जाते लेकिन अँधेरा हो चुका था और इस रास्ते पर ज्यादा ट्रैफिक भी नहीं होता साथ ही रुद्रप्रयाग पहुँचने तक दस बज जाएंगे ये निश्चित था। तय हुआ कि बायीं ओर ही मुड़ लेते हैं, पौड़ी पहुँचकर मुख्य हाईवे पकड़ लेंगे, समय रहते जहाँ तक पहुँच पायेंगे वहीँ रात्रि विश्राम के लिए रुक जाएंगे।

 

पौड़ी पहुँचते तब तक रात हो चुकी थी यहाँ से श्रीनगर की दूरी मात्र 29 किलोमीटर ही है आराम से एक घण्टे में श्रीनगर भी पहुँच जाएंगे। सुबह छह बजे से लगातार चले ही जा रहे थे, अगर हम ताड़केश्वर से वापिस लैंसडौन चले जाते और फिर पौड़ी वाला मार्ग लेते तो काफी पहले ही पौड़ी पहुँच चुके होते। आराम से चलते हुए आठ बजे श्रीनगर पहुँच गए। बस अड्डे के पास ही एक होटल में दो कमरे ले लिए और आज की रात यहाँ श्रीनगर ही रुकने का निर्णय ले लिया। दिल्ली से जब हस्तिनापुर का बोल के चला था तो घर पर आज रविवार को वापिस पहुँचने का बोल कर आया था। लेकिन आज तो 350 किलोमीटर दूर श्रीनगर में होटल में पड़ा हूँ, अब कल रात तक हर हाल में घर पहुँचना ही होगा यह सोचकर कल की प्लानिंग शुरू कर दी।

 

 

कल सुबह अगर हम रुद्रप्रयाग से आगे कार्तिक स्वामी तक जाते हैं तो किसी भी सूरत में कल रात तक दिल्ली वापिस नहीं पहुँच सकते। इसलिए कार्तिक स्वामी के दर्शन भविष्य में फिर कभी कर लेंगे अभी दिल्ली की ओर ही कूच करते हैं। मनु भाई अभी कुछ समय पहले ही टेहरी की ओर आए थे तो उनको किसी स्थानीय ने एक गाँव में ये बता दिया कि वो यहाँ उनको जमीन दिलवा देंगे। मनु भाई की इच्छा थी कि हम भी उस जगह को देख लें। तो तय हो गया कि कल टेहरी की ओर निकल कर दिल्ली वापिस निकल जाएंगे। श्रीनगर पहुँचते ही सुमित को फोन कर दिया था, कुछ देर बाद सुमित भी होटल में ही आ पहुंचा रात को वो भी हम सभी के साथ यहीं रुकेगा, काफी देर तक गप्पों का दौर चला मुझे तो कब नींद आ गई मालूम ही नहीं पड़ा।

 

 

सुबह सात बजे तक सभी तैयार हो गए और निकलने की तैयारी शुरू कर दी। बस अड्डे पर पहुँचकर चाय पी और टेहरी की ओर चल पड़े। कीर्तिनगर से कुछ आगे मलेथा गाँव से एक सड़क दाहिनी ओर जाती है जो सीधे टेहरी निकलती है। मलेथा गाँव का गढ़वाल के इतिहास में बहुत बड़ा स्थान है। पूर्व में जब गढ़वाल में राजशाही थी तो इस गाँव के एक निवासी हुआ करते थे “माधो सिंह”। मलेथा गाँव के अलकनन्दा के किनारे पर बसा होने के बावजूद यहाँ पानी की भारी किल्लत हुआ करती थी। चूँकि अलकनन्दा से कुछ ऊंचाई पर यह स्थान है इसलिए नदी का पानी यहाँ के किसी काम का नहीं था। खेतों की सिंचाई के लिए स्थानीय निवासी एक-एक बूँद पानी के लिए तरसते थे।

 

 

माधो सिंह राजा महिपतशाह की सेना में सेनापति थे। तब गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर में हुआ करती थी। एक बार माधो सिंह अपने गाँव मलेथा आए तो जब उनकी पत्नी ने उन्हें रुखा-सूखा भोजन खाने को दिया तो माधो सिंह ने अपनी पत्नी से इसका कारण पूछा। तब उनकी पत्नी ने बताया कि गाँव में पानी की इतनी किल्लत है कि ना तो सब्जियां उगाई जा सकती हैं ना ही कुछ। माधो सिंह को ये बात चुभ गई। मलेथा गाँव के दूसरी ओर पहाड़ के पार चंद्रभागा नदी बहती थी। चूँकि बीच में पहाड़ होने के कारण उसका पानी भी इस ओर नहीं आ सकता था तो माधो सिंह ने पहाड़ में सुरंग बनाने की ठान ली। पहले तो माधो सिंह अकेले ही इस काम में जुट गए लेकिन बाद में पूरे गाँव के लोग भी उनके साथ हो गए।
सुरंग पूरी होने के बाद भी जब चंद्रभागा का पानी पहाड़ के इस ओर नहीं आया तो सभी परेशान हो गए। एक रात माधो सिंह के सपने में उनकी कुल देवी ने आकर कहा कि अगर तुम पुत्रबलि दोगे तभी पानी मलेथा गाँव तक आ पाएगा। माधो सिंह के एकलौते पुत्र थे गजेसिंह, जब गजेसिंह को इस बात का मालूम पड़ा तो वह खुद की बलि के लिए सहर्ष तैयार हो गए। इसके बाद पूरे क्षेत्र की भलाई को देखते हुए माधो सिंह ने अपने एकलौते पुत्र की बलि दे दी। इसके बाद चंद्रभागा नदी का पानी सुरंग से होकर मलेथा गाँव तक पहुँच गया। जो इस क्षेत्र और इस गाँव की प्यास आज तक बुझा रहा है। माधो सिंह की वीरता के गाने आज भी गाये जाते हैं, एक गाने की पंक्ति इस प्रकार है…
एक सिंह रैंदो बण, एक सिंह गाय का।
एक सिंह माधोसिंह, और सिंह काहे का।
इसका हिंदी शब्दार्थ इस प्रकार है :-
एक सिंह वन में रहता है, एक सींग गाय का होता है। एक सिंह माधोसिंह है। इसके अलावा बाकी कोई सिंह नहीं है।
मलेथा से आगे बढ़कर हम टेहरी की ओर चल पड़े, कुछ आगे चलकर मगरौ गाँव आता है, यह जगह मनु भाई को इतनी पसन्द आई थी कि यहीं घर बसाने की ठान ली इसलिए हम सभी को भी यहाँ ले आए। कुछ देर यहाँ रुककर आस-पास का इलाका देखा, यहीं सड़क किनारे एक ढाबे पर नजर पड़ी तो नाश्ते का आर्डर भी दे दिया। शानदार आलू के पराँठे खाकर जब तृप्ति हुई तो आगे बढ़ चले। मगरों से कुछ ही दुरी पर पौखाल बाजार से भी बिना रुके हुए आगे चल पड़े। कुछ आगे जाकर जब टेहरी झील का विहंगम दृश्य सामने नजर आया तो बिना कहे ही गाडी पर ब्रेक लग गए और फोटोग्राफी शुरू हो गई।
सामने पर टेहरी का प्रसिद्द खेंट पर्वत और उसके नीचे टेहरी झील यहाँ से शानदार दिखती है। काफी देर तक टेहरी झील को निहारते रहने के पश्चात आगे बढ़ चले। यह सड़क पीपलडाली पर टेहरी से रुद्रप्रयाग निकलने वाली सड़क पर मिल जाती है। यहां पीपलडाली पर ही झील के उस पार जाने के लिए उत्तराखण्ड प्रसिद्द पुल पर कुछ देर रुककर फोटोग्राफी की गई। झील के साथ आगे बढे तो टिपरी रोपवे दिखाई दिया, इसकी भी सवारी करने के लिए मन ललचा गया। 984 मीटर लम्बे इस रोपवे के बनने से दूसरी ओर के गाँवों के लोगों का जीवन बहुत आसान हो गया, अन्यथा टेहरी झील के दूसरी ओर के गाँवों का दुखड़ा वही जानता है जो उस पार रहता है। रोपवे का चक्कर काटने के बाद आगे बढे तो मालूम पड़ा इस बार टेहरी शहर में जाने के लिए आम यातायात बाँध के ऊपर से ही जा रहा है। उससे पहले जब भी इधर से गुजरा था तो कभी बाँध के ऊपर से जाकर दूसरी ओर जाने का मौका नहीं मिला था।
हर एक आने-जाने वाले को कड़ी सुरक्षा से होकर ही डैम के ऊपर से गुजरने दिया जा रहा था। हमारी गाडी की भी अच्छी-खासी तलाशी होने के पश्चात ही आगे जाने दिया गया। डैम के पार जाकर आगे झील के किनारे पानी में कई प्रकार के मनोरंजक खेलों के लिए विशेष जगह बनाई गई है। जहाँ पर कई प्रकार के वाटरस्पोर्टस होते हैं। आज भी यहाँ पर काफी भीड़ थी, हम भी कुछ देर रुककर लोगों को इन खेलों का मजा लेते हुए देखते रहे। दिन के दो बज चुके थे अब जल्दी से यहाँ से आगे बढ़ने की बारी थी, घर पर एक दिन का कहकर निकला था और यहाँ तीन दिन हो चुके थे। जल्दी से दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया।
थलीसैण

 

थलीसैण

 

एक और बरसूड़ि गाँव

 

बादल फटने के साइड इफेक्ट

 

कीर्तिनगर

 

माल्टा

 

कद्द

 

पहाड़ी टमाटर

 

 

मगरों

 

पौखाल बाजार

 

टेहरी झील और खेंट पर्वत

 

पीपलडाली पुल

 

टेहरी झील

 

टिपरी रोपवे

 

टेहरी झील पर वाटर स्पोर्ट्स

 

 

पंवाली कांठा ट्रैक – भाग 1

पंवाली कांठा ट्रैक, आयोजन व पहला दिन
 

पिछले माह जब से लैपटॉप चोरी हुआ है, मन में खटास सी आ गयी। आर्थिक नुकसान तो जो हुआ सो हुआ सबसे ज्यादा दुख आज तक की सारी फ़ोटो के चले जाने का हुआ। कैमरे के कार्ड में सिर्फ पंवाली ट्रैक की ही फ़ोटो थी जो सुरक्षित बची रह गयी। इसलिए इसी यात्रा वृतान्त से आगे बढ़ते हैं। हालांकि कुछ मित्रों को निराशा होगी, क्योंकि उनके साथ मैंने यात्राएं की व उस यात्रा को ब्लॉग पर स्थान नहीं दे पा रहा हूँ।

पंवाली ट्रैक काफी समय से मन में था, कई बार कोशिश भी की लेकिन हर बार कुछ न कुछ अड़ंगा लग ही जाता था। होली पर जब घूम कर वापिस आया तो आते ही अमित तिवारी भाई ने पंवाली ट्रैक की बाबत पूछ लिया। मैंने भी हामी भर दी व कह दिया कि अपनी छुट्टियां देख कर डेट फाइनल कर लो मैं साथ चलूँगा।
पंवाली जाने के लिए हम पांच दोस्तों का ग्रुप भी बन गया जिसमें अमित तिवारी (गुरुग्राम), शशि चड्डा (गजरौला, उ.प्र.), नटवर भार्गव (राजस्थान), रविन्द्र भट्ट (रांसी, उत्तराखण्ड) से साथ चलेंगे। चूंकि भट्ट जी उत्तराखण्ड में हैं व स्वयं भी शानदार ट्रैकर हैं तो ट्रैक के लिए जरूरी व्यवस्थाओं पोर्टर से लेकर राशन आदि की सारी जिम्मेदारी भट्ट जी को सौंप दी गयी। हम सभी लोग 12 अप्रैल रात को दिल्ली से चलकर 13 अप्रैल को सीधे सोनप्रयाग में मिलेंगे।
नटवर भाई ने अपनी ट्रैन की टिकिट इस हिसाब से बुक की थी कि वो 12 अप्रैल शाम तक दिल्ली पहुंच जाएगा व यहीं से हमारे साथ हो लेगा। शशि भाई पहले दिन शाम को ही हरिद्वार पहुंच जाएंगे व अगले दिन सुबह चार बजे हमें हरिद्वार बस अड्डे पर मिल लेंगे। भट्ट जी पोर्टर लोगों के साथ सीधे गुप्तकाशी या सोनप्रयाग में मिल लेंगे।
पंवाली ट्रैक का प्रचलित मार्ग है त्रियुगीनारायण से शुरू करके टेहरी के घुत्तू कस्बे में निकलने का। इस ट्रैक को घुत्तू से शुरू कर त्रियुगीनारायण में भी समाप्त किया जाता है। सावन के महीने में जब कांवड़ यात्रा शुरू होती है तो भोले भक्त गंगोत्री से गंगाजल लेकर इसी रास्ते से निकलते हैं व केदारनाथ में जल अर्पण करते हैं। असल में यह ट्रैक अभी तक जितना भी प्रचलित है सिर्फ कांवड़ियों के कारण ही है। अन्यथा बहुत ही कम ट्रैकर यहां जाते हैं। समझ नहीं आता इतना खूबसूरत ट्रैक अभी भी ट्रैकरों की पसन्द क्यों नहीं बन पाया है।
तय दिन 12 अप्रैल से पहली रात को घर से फोन आ गया कि कल सुबह छोटी बहिन को गंगाराम अस्पताल में भर्ती होने के लिए वहां के डॉक्टरों ने कहा है व आपरेशन के माध्यम से डिलीवरी होनी है। मेरी चिंताएं बढ़ गई व इस बाबत सभी मित्रों को बता भी दिया कि मेरा साथ चलना आखिरी वक्त पर ही तय हो पाएगा। सुबह मैं अपने ट्रैकिंग बैग के साथ सीधे करोल बाग के नजदीक गंगाराम अस्पताल जा पहुंचा। ईश्वर की कृपा से सब कुछ सही रहा व मैं एक प्यारी सी गुड़िया का मामा बना, घर में प्रसन्नता फैल गई व मुझे खुशी-खुशी ट्रैक पर जाने की इजाजत भी। पूरा दिन अस्पताल में बिताने के बाद शाम के समय मेट्रो से कश्मीरी गेट बस अड्डे जा पहुंचा। अमित भाई पहले से ही मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे व कुछ ही देर बाद नटवर भाई भी राजस्थान से यहां पहुंचने वाले थे।
रात के करीब दस बजे हम तीनो ने हरिद्वार के लिए बस ले ली। जिसने सुबह चार बजे हमें हरिद्वार उतार दिया। हरिद्वार पहुंचकर शशि भाई को फोन किया तो पंद्रह मिनट बाद शशि भाई भी बस अड्डे आ पहुँचे। हरिद्वार से सोनप्रयाग की पहली बस सुबह साढ़े पांच बजे चलनी थी उसी में हम सवार हो गए। देवप्रयाग पहुँच कर नाश्ता किया। रांसी से रविन्द्र भट्ट जी भी टीम के साथ निकल चुके थे व हमें गुप्तकाशी में मिल जाएंगे। दिन के 12 बजे के आस-पास गुप्तकाशी पहुंचे तो भट्ट जी इंतजारी करते हुए मिले। ट्रैक के लिए कुछ जरूरी सामान खरीदने के उपरान्त सोनप्रयाग के लिए निकल पड़े।
दिन के लगभग दो बजे बस ने सोनप्रयाग उतार दिया। भूख भी जोरों से लग रही थी तो एक होटल में दिन का भोजन कर लिया गया। अभी सोनप्रयाग सूना पड़ा हुआ मिला। कुछ दिन बाद चार-धाम यात्रा शुरू हो जाएगी तो केदारनाथ जाने वाले यात्रियों की यहां भीड़ उमड़ पड़ेगी व पांव रखने की जगह भी नसीब होना दूभर हो जाता है। चार-धाम यात्रा की तैयारियों को अन्तिम रूप दिया जाता हुआ दिखा। लेकिन लगा नहीं कि यात्रा शुरू होने तक सारी तैयारियां पूर्ण हो जाएंगी। जिले के कलेक्टर भी यहां दौरे पर पहुंचे दिखाई मिले।
भोजनोपरांत त्रियुगीनारायण जाने की तैयारी शुरू कर दी जो सड़क मार्ग से 12 किलोमीटर व पैदल मार्ग से 5 किलोमीटर दूर है। सोनप्रयाग से बाएं हाथ को त्रियुगीनारायण के लिए सड़क चली जाती है जबकि सीधा मार्ग आगे गौरीकुण्ड तक जाता है, केदारनाथ जाने वाले यात्रियों को यहीं से आगे की यात्रा पैदल ही पूर्ण करनी होती है। यहीं भट्ट जी का एक जानकार टैक्सी ड्राइवर मिल गया जो हमें त्रियुगीनारायण छोड़ देगा।
सोनप्रयाग से त्रियुगीनारायण के लिए सीधी चढ़ाई वाला मार्ग है, सड़क पक्की व शानदार बनी हुई है। आधे घण्टे में हम त्रियुगीनारायण पहुंच गए। त्रियुगीनारायण भगवान शिव व पार्वती का विवाह स्थल है, एक भव्य मन्दिर यहां पर बना है, जिसमें सदियों से ज्वाला जलती आ रही है। मन्दिर के दर्शन कल सुबह करेंगे पहले आज की रात गुजारने के लिए ठिकाने की तलाश कर ली जाए।
यहां पर मन्दिर में धर्मशाला भी है, लेकिन जब कमरे देखे तो रख रखाव का नितान्त अभाव दिखाई दिया। साफ-सफाई भी कमरों में दूर-दूर तक नजर नहीं आई। ऐसे हमारे पास खुद के टैण्ट, स्लीपिंग बैग, राशन आदि सब कुछ उपलब्ध था लेकिन कल से पूरे ट्रैक पर इन्ही सबका इस्तेमाल करना है इसलिए आज की रात जब मिल रहा है तो क्यों न आराम से गुजारी जाए इसलिए यहीं पर एक होटल में दो कमरे ले लिए। खाना भी इसी होटल में मिल जाएगा।
चूंकि अभी अंधेरा होने में काफी समय था इसलिए आस-पास भ्रमण कर लिया जाए तो जल्दी से कमरों में सामान रख गौरी गुफा देखने के लिए निकल पड़े जो गांव से डेढ़ किलोमीटर ऊपर है। गांव के बीच से होते हुए ठीक ऊपर की ओर रास्ता जाता है, स्थानीय लोग खेतों में काम करते हुए मिले जो कि मुझे सुखद एहसास दिलाता है। पूछते-पूछते गौरी गुफा तक जा पहुंचे। यहां पहुंचने के लिए अंतिम सौ मीटर तो रास्ता है ही नहीं, अगर आपको पहाड़ों का अनुभव है तो ही अकेले जाएं अन्यथा किसी स्थानीय को साथ जरूर ले जाएं।
पहाड़ की चट्टान पर दो छोटे-छोटे छेद बने हैं जिन तक पहुंचना भी हर किसी के बस की बात नहीं। थोड़ा बहुत रॉक क्लाइम्बिंग करके ही ऊपर चढ़ सकते हैं व मोगली बनने के चक्कर मे गल्ती से पैर फिसला तो एक दो हड्डी टूटनी तय हैं। खैर हम सभी एक-एक कर चढ़े व गुफा के दर्शन किए। मान्यता है कि इस गुफा का दूसरा सिरा नेपाल में निकलता है, लेकिन मुझे तो इसका पहला सिरा ही नजर नहीं आया।
खैर, हमें यहां कुछ न कुछ तो घूमना ही था व कल से ट्रैक शुरू करना है तो थोड़ा अभ्यास भी हो गया। गप्पें लड़ाते-लड़ाते वापिस त्रियुगीनारायण होटल में आ गए। गौरी गुफा जाते हुए होटल मालिक ने रात के खाने की बाबत पूछा था तो हमने ठेठ स्थानीय खाने के लिए कहा था। हमारे पोर्टर भी आस-पास घूमने गए तो “लिंगोड़े” तोड़ लाए जिसकी सब्जी बनेगी। लिंगोड़े पहाड़ों पर मिलने वाली प्रसिद्ध जंगली सब्जी है। बेहद पौष्टिक व आयरन से भरपूर यह सब्जी पहाड़ों पर गर्मियों व बरसात के समय आसानी से मिल जाती है। खाने में इसका स्वाद ठीक किसी भी हरे पत्तों वाली सब्जी के जैसा होता है। बनाने की विधा भी सामान्य ही है बस जंगलों में उगती है तो साफ-सफाई का विशेष ध्यान देना होता है। बाकी जैसा राई, चोलाई आदि के पत्तों की सब्जी बनती है वैसे ही इसको भी बनाते हैं।
लिंगोड़े की सब्जी के साथ स्थानीय राजमा का स्वाद लिया गया। सुबह नाश्ते में परांठे बनाने व दिन के भोजन के लिए भी परांठे पैक करने को कहकर आराम करने कमरों में आ गए। कल से बहुप्रतीक्षित पंवाली की चढ़ाई नापने की तैयारी जो करनी थी।

 

त्रियुगीनारायण

 

त्रियुगीनारायण

 

त्रियुगीनारायण

 

त्रियुगीनारायण

 

गौरी गुफा

 

गुफा का रास्ता

 

दो शूरवीर

 

चढ़ जा

 

केदार बाबा

 

त्रियुगी गांव

 

सुबह का नाश्ता

 

रात का ठिकाना

 

त्रियुगीनारायण प्रवेश द्वार

 

त्रियुगीनारायण मन्दिर

 

 

लिंगोड़े